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नैनीताल हाईकोर्ट के स्थानांतरण पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की चुप्पी। 

हाईकोर्ट के स्थानांतरण पर सत्ताधारियों की चुप्पी।

पिछले कुछ दिनों से उत्तराखंड हाई कोर्ट को नैनीताल से ऋषिकेश शिफ्ट करने या उसकी एक बेंच ऋषिकेश में बनाने को लेकर हंगामा हो रहा है, इसको लेकर वकीलों-अधिवक्ताओं और विपक्ष के नेताओं में काफी आक्रोश नजर आ रहा है, सभी लोग इसके खिलाफ आंदोलन की बात कर रहे हैं लेकिन प्रदेश के मुखिया पुष्कर सिंह धामी और भाजपा के बड़े नेता इस मामले में चुप्पी साधे बैठे हुए हैं जिसका अच्छा संदेश नहीं जा रहा है।

जानिए क्या है पूरा मामला?

दरअसल पिछले दो-तीन सालों से उत्तराखंड हाई कोर्ट को नैनीताल से कहीं और स्थापित करने को लेकर चर्चाएं चल रही है, कभी नाम हल्द्वानी का आता है तो कभी गोलापार और रामनगर का लेकिन इन्हीं चर्चाओं के बीच एक मामला उछलकर आया है जिसमें हाई कोर्ट के कुछ वरिष्ठ जज प्रस्ताव रखते हैं कि हाई कोर्ट की एक बेंच ऋषिकेश में शिफ्ट की जाए।

जिसको लेकर हंगामा खड़ा हो गया, कोर्ट में वकीलों- अधिवक्ताओं ने प्रदर्शन किया है और इसका विरोध जताया है, विपक्षी पार्टी कांग्रेस और उत्तराखंड क्रांति दल ने अपनी बात रखते हुए कहा की हाईकोर्ट को उत्तराखंड के नैनीताल जिले में ही कहीं स्थापित किया जाना चाहिए, जिसमें अलग-अलग लोगों ने अपनी अलग-अलग राय रखी है, कुछ लोग चाहते हैं कि उधम सिंह नगर में शिफ्ट किया जाए और कुछ लोग चाहते हैं गोलापार या रामनगर में शिफ्ट किया जाए।

प्रदेश के मुखिया पुष्कर सिंह धामी मौन!

प्रदेश में डबल इंजन भाजपा की सरकार होने के बावजूद उसके बड़े नेताओं ने इस मामले पर कोई बयान नहीं दिया है, यहां तक की प्रदेश के मुखिया पुष्कर सिंह धामी ने भी चुप्पी साध रखी है वो कभी मुंबई में तो कभी उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए वोट मांगते जरूर दिख रहे हैं पर इस मामले पर मानो उन्हें कुछ पता ही नहीं है। इसी बात को लेकर उन पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं, लोगों का कहना है कि पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड को लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं है उन्हें फर्क नहीं पड़ता है कि उत्तराखंड में क्या हलचल हो रही है, उन्हें बस उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नकल करना आता है।

इसी बीच लोगों का कहना है कि उत्तराखंड की सभी संस्थाओं और योजनाओं को तराई में ही क्यों स्थानांतरित कर दिया जाता है प्रदेश का सचिवालय और राजधानी देहरादून में, औद्योगिक संस्थान उधम सिंह नगर और हरिद्वार में, एम्स ऋषिकेश में और उसका सैटेलाइट सेंटर खटीमा में।

अब हाई कोर्ट को भी स्थानांतरित कर किसी तराई क्षेत्र में ही स्थापित कर दिया जाएगा जबकि उसकी एक बेंच ऋषिकेश में बनाने की बात चल रही है।

मुख्य सवाल यही है कि

उत्तराखंड एक पर्वतीय राज्य होने के बावजूद यहां के पर्वतीय क्षेत्रों में कोई भी बड़ी योजनाएं और बड़े विभागों को स्थापित क्यों नहीं किया जा रहा है? राज्य की स्थापना उसकी भौगोलिक परिस्थितियों को देखकर की गई थी तो इसके संसाधनों पर तराई का ही अधिकार क्यों?

आखिर कब तक पर्वतीय राज्य के इस पार्वतीय भूखंड को अनदेखा किया जाएगा, कई लोगों का कहना है कि उत्तराखंड की सभी बड़ी संस्थाओं और संसथानों को गढ़वाल में ही स्थापित किया जा रहा है यह कुमाऊं के साथ एक बहुत बड़ा अन्याय है और इस अन्याय के लिए कुमाऊं के वे सभी नेता जिम्मेदार हैं जिन्हें कुमाऊं की जनता ने चुनकर विधानसभा और लोकसभा भेजा है, जो जनता के वोटो पर सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं और सरकारी आवासों में बैठकर मजे ले रहे हैं।

भाजपा-कांग्रेस दोनों की अकर्मण्यता

उत्तराखंड को बने हुए 24 साल होने के बावजूद गैरसैण में राजधानी को स्थापित नहीं कर पाना भाजपा और कांग्रेस दोनों की अकर्मण्यता का परिणाम है दोनों ही पार्टियों के नेताओं ने सिर्फ अपना ही भला चाहा और वो लोग केंद्र में बैठी अपनी सरकारों की चाटुकारिता ही करते रह गए,

दो-चार नेताओं को अगर छोड़ दें तो किसी ने भी गैरसैण में राजधानी की पैरवी नहीं की, ये बात अलग है कि जब वो लोग सत्ता से विहीन होकर विपक्ष में गए तब उन्हें कई बार गैरसैण की याद अवश्य आती रही है।

बीजेपी कांग्रेस

एक चेतावनी सरकार के लिए

नेता भले ही इस मामले पर चुप बैठ गए हो लेकिन यहां की जनता चुप बैठने वाली नहीं है, अगर हाईकोर्ट को स्थानांतरित किए जाने की बात आती है और उसे जानबूझकर तराई क्षेत्र में  स्थापित किया जाता है तो इसके खिलाफ एक भव्य आंदोलन के लिए सरकार को तैयार रहना होगा, क्योंकि हमारे पूर्वजों ने तराई के विकास और नेताओं के मौज काटने के लिए नहीं की है उत्तराखंड राज्य की मांग।

हमारी मांग है की राजधानी गैरसैण में बने और उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के पार्वतीय जिलों में हाईकोर्ट को स्थापित किया जाए। क्योंकि हाईकोर्ट के बनने से उस क्षेत्र का विकास हो पाएगा और जो लोग उत्तराखंड की जनता की सेवा के लिए सरकारी वेतन पा रहे हैं उन्हें जनता की तकलीफों का अंदाजा भी हो पाएगा ताकि उन समस्याओं का समाधान हो सके। सरकार भूलकर भी ये न समझे की शांत प्रदेश के सीधे-सादे लोगों को आसानी से गुमराह कर वो अपना उल्लू सीधा कर लेगी, क्योंकि जो जितना शांत दिखाई देता है वो अंदर से उतना ही खतरनाक भी होता है।।

निष्कर्ष÷

हाईकोर्ट के तराई में स्थानांतरित किए जाने व उसके एक और बेंच ऋषिकेश में बनाए जाने को लेकर निष्कर्ष यही निकलता है कि सत्ता में बैठा हुआ व्यक्ति चाहता ही नहीं है कि पर्वतीय क्षेत्र में विकास हो इसीलिए वो हर चीज तराई की तरफ ही स्थानांतरित करना चाहता है जिससे उसे पहाड़ न चढ़ाना पड़े और उसे पहाड़ों की जटिल समस्याओं से जूझना ना पड़े।
उन्हें पहाड़ के लोगों से सिर्फ और सिर्फ वोट की उम्मीद है और वे चाहते हैं की जनता 5 किलो राशन में खुश होकर उनके आलाकमान की चाटुकारी करें।

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