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सरकार द्वारा थोपे गए अटल आदर्श विद्यालय ही विद्यार्थियों के लिए मुसीबत की जड़ बन चुके हैं।

उत्तराखंड के अटल आदर्श विद्यालय बने मुसीबत की जड़

मोदी सरकार शुरू से ही अपने तुगलकी फरमानों के लिए मशहूर है इसी प्रकार का एक तुगलकी फरमान जारी किया गया सरकारी विद्यालयों पर जहां वर्षों से बच्चे उत्तराखंड बोर्ड में हिंदी मीडियम से अपनी पढ़ाई कर रहे थे उन्हीं में से कुछ स्कूलों को अपनी उपलब्धि दिखाने के लिए मोदी सरकार ने उनका नाम अपने कार्यकर्ताओं के बाप-दादाओं-रिश्तेदारों के नाम रखकर उन्हें अटल उत्कृष्ट की उपाधि दे दी, वहां सीबीएससी पैटर्न हेतु प्रचुर मात्रा में शिक्षक भले हो ना हो लेकिन शिक्षा व्यवस्था अपने हिसाब से करने की पूरी कोशिश की गई।

आज इसी का खामियाजा उन बच्चों को भुगतना पड़ रहा है जो बच्चे गणित और अंग्रेजी में कमजोर है क्योंकि इन स्कूलों में अब पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से की जा रही है कई बच्चे एक ही क्लास में दो-दो बार फेल हो जा रहे हैं, क्योंकि जिन बच्चों ने कक्षा आठवीं तक बढिय़ा करके A B C D नहीं सीखी है वे बच्चे अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई कैसे कर लेंगे?
और वो बच्चियां जिन्हें एक सफल गृहिणी बनकर अपना जीवन यापन करना है उनपर जबरदस्ती गणित का बोझ डालकर मानसिक तनाव देना कितना जायज है?

ऐसे मामले पिछले साल भी प्रदेश भर से आ रहे थे और इस साल भी हर जगह से ऐसी ही घटनाएं सामने आ रही हैं।

आज हम बात करेंगे अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर विधानसभा के अटल आदर्श विद्यालय सलौंज की जहां बच्चे हताश और निराश होकर अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर रो रहे हैं।

जानिए क्या है पूरा मामला ÷

उत्तराखंड॥ अल्मोड़ा जिले के सोमेश्वर का अटल आदर्श विद्यालय सलौंज जोकि पिछले एक – डेढ़ साल पहले तक राजकीय इंटर कॉलेज हुआ करता था उसे सरकार ने अटल उत्कृष्ट बना दिया अब वहां शिक्षा पद्धति बदल गई है क्योंकि वहां अब उत्तराखंड बोर्ड की जगह सीबीएसई बोर्ड ने ले ली है, जिसमें कक्षा आठवीं के बाद गणित और अंग्रेजी अनिवार्य होती है, इसके चलते जिन बच्चियों की गणित कमजोर है और जिन लड़कों की अंग्रेजी कमजोर है वो बच्चे यहां दो-दो बार तक फेल हो जा रहे हैं, फेल होने की इन बढती घटनाओं को देखते हुए बच्चे अटल उत्कृष्ट विद्यालय से अपना नाम कटवाकर नजदीकी हिन्दी मीडियम के विद्यालयों में अपना दाखिला कराना चाहते हैं, जिसमें जूनियर हाई स्कूल लखनाड़ी और जूनियर हाईस्कूल लोद शामिल है।

आरोप ये लग रहे हैं कि उन्हें इन स्कूलों में ये कहकर एडमिशन नहीं दिया जा रहा है कि तुमने कक्षा 6 से जहां पढ़ा है आप वही एडमिशन लीजिए और शिक्षक दूसरे स्कूलों के कमजोर विद्यार्थियों को अपने स्कूल में दाखिला कराने से कतरा रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है कि 10वीं की परीक्षा में उनका रिजल्ट खराब हो जाएगा, ऐसे में वे विद्यार्थी दोबारा से मजबूरन अटल उत्कृष्ट विद्यालय में अपना दाखिला लेने पर मजबूर हो रहे हैं।

इस संबंध में हमने दोनों स्कूलों के से बात करने की कोशिश की तो कुछ बातें सामने आयी जोकि इस प्रकार हैं

अटल आदर्श विद्यालय के अनुसार

अटल उत्कृष्ट विद्यालय की तरफ से प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसे बच्चे जो अंग्रेजी और गणित में बहुत ही कमजोर है और 9 वीं की सीबीएससी की पढाई उनके समझ में नहीं आ रही है या फेल हो जा रहे हैं वो बच्चे यहां से अपना नाम कटवा कर अन्य स्कूलों में दाखिला लेना चाहते हैं लेकिन अन्य स्कूलों में उन्हें इसलिए दाखिला नहीं दिया जा रहा है क्योंकि उन बच्चों ने कक्षा 6 से इसी अटल उत्कृष्ट विद्यालय में पड़ा है।

अटल उत्कृष्ट विद्यालय से जानकारी में पता चला कि उनके स्कूल में गृहविज्ञान और हिन्दी माध्यम की पढ़ाई न होने के कारण भी बच्चे अपना नाम दूसरे स्कूलों में लिखाना चाह रहे हैं पर अन्य स्कूल उनको दाखिला न देने के अलग-अगल बहाना बना रहे हैं।

हिन्दी मीडियम विद्यालय के अनुसार

हिन्दी मीडियम स्कूलों का कहना है कि “उत्कृष्ट विद्यालय के एक दो अध्यापक पढाई में सबसे कमजोर बच्चों को डीमोटिवेट करके उनका नाम काटकर उन्हें टीसी थमा दे रहे हैं और दूसरे स्कूलों में जाकर एडमिशन लेने के लिए कह रहे हैं, अटल उत्कृष्ट विद्यालय के कुछ अध्यापकों को गरीब बच्चों के भविष्य से ज्यादा उनका दसवीं में आने वाला अंक प्रतिशत महत्वपूर्ण है इसीलिए वे लोग कमजोर विद्यार्थियों को दूसरे स्कूलों में एडमिशन लेने के लिए बोल रहे हैं”।

उनका ये भी कहना था कि जो बच्चे पढाई में बहुत ज्यादा कमजोर हैं अगर उनसे अटल उत्कृष्ट का रिजल्ट खराब हो सकता है तो हम उनको एडमिशन देकर अपना रिजल्ट खराब कर खुद पर सवाल खड़े करने का मौका क्यों दें?

जानिए अभिभावकों का क्या कहना है

बच्चों के अभिभावकों से बातचीत करने पर पता चला है कि इस सारे मामले के पीछे मुख्य कारण उनके बच्चों का हाथ अंग्रेजी में टाइट होना ही है और सरकार द्वारा इंग्लिश मीडियम में पढ़ाने के लिए जो अध्यापक नियुक्त करने की घोषणा थी वो अभी तक धरातल पर नहीं उतर पायी।

ताज्जुब की बात ये है कि जिस देश की मातृभाषा ही हिन्दी हो वहां के बच्चों का हिन्दीभाषी होना ही देश के भविष्य को भारी पड़ रहा है।

निष्कर्ष ÷

सरकार के तुगलकी फरमानों से आम जनता हर बार परेशान होती ही है और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनके समर्थक भी इस फरमान का शिकार हो रहे हैं, ऐसे में भगवान से उंचा दर्जा प्राप्त कर चुके शिक्षक अगर अपना रिकार्ड चमकाने के लिए उन बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करेंगे तो कैसे काम चलेगा?

उक्त लेख में तीन महत्वपूर्ण बिंदू हमें नजर आए जोकि इस प्रकार हैं

1- सरकार को स्कूलों की शिक्षा पद्धति में इतने बड़े बदलाव करने से पहले ये जांच लेना चाहिए कि जिस स्कूल को वो हिन्दी मीडियम से अंग्रेजी में परिवर्तित कर रहे हैं क्या उस स्कूल के बच्चे इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं क्या उनका बेस इतना मजबूत है कि वो इस परिवर्तन को स्वीकार कर सकें?

2- अटल उत्कृष्ट विद्यालयों में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों माध्यमों की पढाई का विकल्प होना चाहिए और अगर कोई विद्यार्थी किसी अन्य स्कूल में एडमिशन लेना चाहता है तो उसके लिए विकल्प खुले होने चाहिए।

3- स्कूलों को अपने 10वीं और 12वीं के रिजल्ट की चिंता छोड़कर इस चीज की चिंता करनी चाहिए कि जिन गरीब बच्चों की वजह से वो सरकारी अध्यापक बने हैं, जिन बच्चों के कारण उनके घर का चूल्हा जल रहा है कम-से-कम उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो, सारे स्कूल अगर गरीब और कमजोर छात्र-छात्राओं को एडमिशन देने में आनाकानी करेंगे तो उनके भविष्य का क्या होगा क्या शिक्षा के अधिकार से उन्हें वंचित रखना न्याय होगा?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 का उल्लंघन कर स्कूल और वहां के अध्यापक खुद के लिए मुसीबत मोल ले रहे हैं उन्हें ये कतई नहीं भूलना चाहिए कि समाज में कुछ लोग हैं जो जनपक्ष को साथ लेकर चलते हैं और अन्याय के खिलाफ पूरी ताकत से आवाज उठाते हैं।।

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