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पहाड़ की नारी चुनाव की मारी

पहाड़ की नारी

राजनीतिक प्रचार-प्रसार के दौरान महिलाओं की बढ़ती हुई संख्या लेखक को सोचने पर विवश कर चुकी है कि क्या पहाड़ की महिलाएं अब सशक्त हो चुकी हैं?

पहाड़ की नारी अब सशक्त हो चुकी हैं।
जिन महिलाओं के बारे में कहा जाता था कि पहाड़ की महिलाओं के पास एक गिलास पानी पीने का समय नहीं होता है, उन्हीं महिलाएं के पास चुनाव के दौरान पूरे-पूरे दिन नेताओं का भाषण सुनने का, उनकी रैलियों में जाने का, घर घर प्रचार-प्रसार करने का समय हो जाता है।
जो महिलाएं घर में अपने साथ हो रहे अत्याचार के खिलाफ़ हल्की सी आवाज भी नहीं उठा सकती है चुनाव के दौरान वही महिला सरकार के खिलाफ़ या पक्ष में जोरदार नारे लगा सकती है।
जो अपने स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा को लेकर कभी चिंतित नहीं हुई, चुनाव के दौरान वो महिला भी अपने पसंद के नेता और पार्टी की हार – जीत को लेकर परेशान है।
जो आज नेताओं की सबसे चहेती है, कहने को तो मातृशक्ति है पर कल को भुला दी जाएगी बड़े-बड़े वादों की तरह।।
#पहाड़_की_नारी।

नारीशक्ति नहीं महिलाओं की भीड़

असल में पहाड़ की नारी अब चुनावी भीड़ बन चुकी है जिसको नेता चुनाव के समय अपने जनसभा की शोभा बढाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।।

वैसे ये समस्या सिर्फ महिलाओं की नहीं है, इससे भी बुरा हाल है पुरुषों का पर पुरुष बदनाम है इस चीज के लिए उसपर आरोप लगता रहा है कि पुरुष शराब और शिकार के लिए नेताओं के पीछे लगा रहता है लेकिन महिलाओं का जाना इस भ्रमजाल को तोड़ता हुआ दिखाई देता है।

हकीकत तो ये है कि नारी का सम्मान, नारी शक्ति, महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे नारे लगाए ही इसीलिए जाते हैं ताकि महिलाओं को मोहरा बनाया जा सके।

खैर जो भी हो महिलाओं को नेताओं के झांसे में नहीं आना चाहिए क्योंकि उनको आगे बढने का मौका जब उन्हीं के घरवाले नहीं दे रहे हैं तो राजनीति के शातिर गिद्ध लोग उनका क्या भला करेंगे?

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