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आखिर कौन लगा रहा है उत्तराखंड के जंगलों में आग?

जल रहे हैं जंगल और सो रही है सरकार आखिर कौन है इसके लिए जिम्मेदार?

पिछले कुछ सालों से लगातार अप्रैल और मई के महीने में उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, साल दर साल उत्तराखंड के जंगल जल रहे हैं, जंगली जानवर लोगों के आवासीय क्षेत्रों में आ रहे हैं, करोड़ों जीवजंतु मारे जा रहे हैं, पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है और गर्मी बढ रही है, बावजूद इसके शासन-प्रशासन इस और ध्यान नहीं दे रहा है, स्थानी लोग आग बुझाने का प्रयास करते हुए कई बार झुलस चुके हैं कई लोगों के मारे जाने की खबरें भी इसी बीच आती रही है, सरकार की उदासीनता पर बात करने के बजाए हम इस लेख में बात करेंगे कि आखिर यह आग लगाता कौन है?

आग लगाने वाला आखिर कौन?

आज हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे कि उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने वाला आखिर कौन है, वो कौन है जो हमारी वन संपदा को नुकसान पहुंचा रहा है? इसपर हमने कई लोगों से आँफकैमरा बात की है तथा कई साथियों के कमेंट्स, पोस्ट इत्यादि पढकर इस मामले को समझने का प्रयास किया है और उसी आधार पर हम लेख भी लिख रहे हैं।

वनकर्मी खुद लगाते हैं जंगलों में आग?

इस विषय पर बात करने के दौरान हमें कई लोगों ने कहा कि वन कर्मी ( पतरौल- फाॅरिस्ट गार्ड इत्यादि) खुद ही जंगलों में आग लगाते हैं, इसपर लोगों का तर्क होता है की वन कर्मी जिनके पास वनों की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है वही लोग चंद रूपयों के लालच में इमारती पेड़ों को बेच देते हैं, बेचे गए उन पेड़ों की खूंटी(कटा हुआ तना), टहनियां नजर न आ जाए तथा उच्च अधिकारियों की जांच-पड़ताल में इस बात का पता न चल जाए कि ये सभी पेड़ इसी साल काटे गए हैं इसी डर से वो लोग खुद ही जंगलों में आग लगा देते हैं और उनके द्वारा लगाई गई आग ही पूरे प्रदेश के जंगलो को नष्ट कर देती है, लाखों जीव-जंतुओं का काल बन जाती है।

वनकर्मी

भेड़ – बकरी के ग्वाले लगाते हैं आग?

कई लोगों का कहना था कि आग लगाने में भेड़-बकरी गाय-भैंस के ग्वाले जिम्मेदार हैं, लोगों का तर्क था कि वे लोग जो जंगलों में अपने जानवर लेकर कई क्षेत्रों में चारावाह बनकर जाते हैं, यही लोग अगले साल अच्छी घास उगने की आस में जंगलों में आग लगाते हैं, उनका मानना है कि सूखी हुई घास को हटाने के बाद ही अगले साल अच्छी किस्म की घास उगती है, आग लगाने से उनका ये काम आसानी से हो जाता है।

पर्यटन

पर्यटक और जंगलों में कैंपिंग करने वाले लगाते हैं आग?

कुछ लोगों का कहना है की जो बाहरी पर्यटक पहाड़ों में मौज मस्ती के लिए आते हैं वही लोग जंगलों में खाना वगैरह बनाते हैं, सिगरेट इत्यादि पीते हैं और जली हुई सिगरेट या फिर जलती हुई आग को छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं जिससे जंगलों में आग फैल जाती है और उन लोगों की लापरवाही के कारण भी हमारे जंगल जल रहे हैं।

जंगलों में शिकारी लगा रहे हैं आग?

कई लोगों का कहना है कि जंगलों में वन्यजीवों का शिकार करने वाले लोगों द्वारा आग लगाई जा रही है उनका कहना है कि जंगलों में हिरण, काकड़, घुरड़, कस्तूरी मृग, मोनाल, जंगली मुर्गी, बाघ इत्यादि जानवरों का शिकार करने के लिए जो लोग जंगलों में जाते हैं वही लोग जंगलों में आग लगा रहे हैं क्योंकि कई जंगली जानवरों को मारने के बाद उनके बेशकीमती अंगों को इकट्ठा कर चीन इत्यादि के बाजारों में बेचने का जो प्रचलन चल रहा है उसी की देखा-देखी में लोगों द्वारा कई जंगली जानवरों का शिकार किया जा रहा है और जंगल में उन्हे मारकर अपनी भूख भी मिटाई जा रही है।

शिकारी

जंगलों में आग लगने के इन गंभीर कारणों के अलावा कुछ सामान्य कारण भी हैं जिनमें

खेतों में लगाई गई आग ही जंगलों तक पहुंच रही है।

कई लोगों का कहना है कि जौं और गेहूं की कटाई के बाद लोग अपने खेतों में आग लगाते हैं वही आग धीरे-धीरे करके जंगलों में फैल जाती है जंगलों में आग फैलने के बाद वह बेकाबू हो जाती है, उसी से उत्तराखंड के जंगल जल रहे हैं।

पत्थर टकराने से लगती है आग?

कई लोगों का कहना है कि फरवरी-मार्च के बाद मौसम शुष्क हो जाता है, गर्मी बढ़ने लगती है पेड़ों के सूखे हुए पत्ते जमीन पर गिरे हुए होते हैं जिसको जलाने के लिए एक चिंगारी ही काफी होती है ऐसे में पहाड़ों से गिरने वाले पत्थर जब आपस में टकराते हैं तो उनके घर्षण से जो चिंगारियां पैदा होती है वो भी आग लगाने का काम करते है, पत्थरों के टकराने से सूखे हुए पत्तों पर लगी हुई आग ही उत्तराखंड के जंगलों को जलाकर खाक कर रही है।

निष्कर्ष ÷

आग लगने के जिन कारणों पर उक्त लेख में लोगों ने अपनी राय दी उनमें से कोई भी कारण ऐसा नहीं है जिसे हम झूठला सकते हैं, उक्त सभी कारण कुछ हद तक आग लगाने के लिए जिम्मेदार हैं, ऐसे में अब सवाल यही है कि आखिर इस आग पर काबू कैसे पाया जा सकता है और उत्तराखंड के जंगलों को कैसे बचाया जा सकता है।

जंगलों को आग से बचाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव।

हर साल हो रहे वन संपदा के नुकसान को बचाने के लिए सबसे पहले सरकार को अपनी कमर कसनी होगी, फरवरी के महीने के बाद ही जंगलों में अपनी चौकसी बढ़ानी होगी तथा नजदीकी ग्रामीणों के संपर्क में रहना होगा और उनसे समय-समय पर जंगलों का जायजा लेना होगा,
जो भी लोग वन विभाग द्वारा वनरक्षक के रूप में भर्ती किए जाते हैं उनकी संख्या भी बढ़ानी होगी और उन्हें आधुनिक तकनीकी से लैस करना होगा, समय-समय पर इस बात की जांच होनी चाहिए कि वे लोग अपने कार्यक्षेत्र के जंगलों में नियमित जा रहे हैं या नहीं, किसी जीपीएस या आधुनिक टैकनोलाजी से इसकी ट्रैकिंग भी होनी चाहिए और उन लोगों की अटेंडेंस का भी एक प्रारूप तैयार किया जाना चाहिए जिससे यह पता लगाया जा सके कि जिस वनरक्षक को जिस भी वनक्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई है क्या वह उस क्षेत्र में है भी या नहीं।
साथ ही आग लगने की घटनाएं जब शुरू होती है उन दिनों ही उसे बुझाने का प्रयास होना चाहिए, ऐसा नहीं कि महीना – डेढ़ महीने से आग लग रही है और सरकार सोई हुई है।

और सबसे महत्वपूर्ण – क्षेत्रीय जनता का दायित्व है कि वह आग लगने की घटनाओं की सूचना तुरंत नजदीकी पुलिस चौकी को दे और जितना हो सके अपने स्तर पर आग को बुझाने में वन विभाग की मदद करें क्योंकि वन संपदा सरकार से पहले स्थानीय जनता की है और इसकी रक्षा करना क्षेत्रीय जनता का कर्तव्य है।

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