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मालौंज गांव, सोमेश्वर क्षेत्र की घटना

मालौंज गांव की घटना

मालौंज गांव की वायरल वीडियो से माहौल गरमाया

पिछले कुछ दिनों से सोमेश्वर में जो सामाजिक मतभेद देखने को नजर आ रहे हैं वह वाकई में चिंताजनक है।
सोमेश्वर के मालौंज गांव की वो वीडियो देखकर मन बड़ा दुखी हुआ, कई बार अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पोस्ट का विचार भी आया पर बिना दूसरे पक्ष को सुने सिर्फ़ एक पक्ष की बातों पर टिप्पणी करना न्याय नहीं होता इसलिए हमने विचार बनाया कि जब तक कोई अखबार वाला या न्यूज पोर्टल वाला इसपर प्रतिक्रिया नहीं देगा तब तक हम इंतजार करेंगे।।
आज 4 – 5 दिन हो गए लेकिन किसी की कोई प्रतिक्रिया नही आयी, अब हमारा दायित्व बनता है कि हम दोनों पक्षो की बातों को आपके बीच रखें।

जानिए मामला क्या है

सोमेश्वर क्षेत्र में एक वीडियो वायरल हो रही है जिसमें देखा जा सकता है कि किसी मंदिर में एक बुजुर्ग व्यक्ति और कुछ बच्चियां आपस में बहस कर रहे हैं।

मालौंज गांव के पहले पक्ष का आरोप

पहले पक्ष जोकि अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखता है उनका कहना है कि फूलदेई के दिन हमारी बच्चियां फूल खेलते हुए नजदीकी शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ जी का आशीर्वाद लेने तथा उन्हें पुष्प अर्पित गई थी जहाँ उन्हें रोका गया, और मंदिर परिसर से बाहर चले जाने को कहा गया, उनका ये भी कहना है कि उन लोगों के साथ हमेशा से ही भेदभाव किया जाता है और मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता है।।

दूसरे पक्ष का स्पष्टीकरण

जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि सारे आरोप मनगणंत हैं, असलियत ये है कि ना तो जातिवाचक शब्दों का प्रयोग किया गया है और न ही हाथ उठाया गया है, और साथ ही मंदिर परिसर में ना आने देने वाली बात भी गलत है क्योंकि वीडियो मंदिर परिसर से ही बनाई गयी है, ये बच्चियां वहां मंदिर की धुनी में कुमाऊँनी गानों में रील्स बना रही थी, मना करने पर बहस करने लग गई और वीडियो बनाकर फेसबुक में डालने की बात कहने लगी।

इस घटना की हम कड़ी निंदा करते हैं

हम बस यही कहना चाहते हैं कि अगर जाति के आधार पर मंदिर जाने से रोकने और भेदभाव की बात सच है तो यह निंदनीय है और अगर मंदिर की धुनी में रील्स बनाने की बात सच है तो वो भी निंदनीय है
वैसे इस मामले की जांच चल रही है और जल्द ही सच सामने आ जाएगा, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।

एक निवेदन

हम बस निवेदन करना चाहते हैं कि इस मामले का राजनीतिकरण न होने दें क्योंकि ये मामला भले कुछ दिनों में शांत हो जाएगा लेकिन इससे समाज में जो घाव लगेंगे उन्हें भरने में सदियाँ बीत जाएंगी।।

इसे भी देखें – आर्थिक आधार पर जातिगत भेदभाव

इसे भी पढ़े – फूलदेई की यादें

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