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भिटौली (भिटोई) एक कुमाउनी परम्परा

भिटौली

भिटौली और एक बाप की ख़ुशी

मेरि लाड़ली जब बटी, बनि रैछ ब्योली
पैली फ्यार मैत आली, लिहुणी भिटौली
आँख भरि देखूंल भोव, चेली की अनार
कसि लागें लाड़ली मेरि, पैरि साड़ी चोली
भौत दुखी छी मन म्यर, जब गेछ बराता
आँखों में आंशु छी म्यारा, जब उठछ डोली
आब मिकूणी सतोंछ भौत, बचपन की याद
उ ठुम ठुम हिटण वीक, कोयल जसि बोली
सुण मेरि कमुली इजा तू, झन मारियै डाड़
भरि दियै आशिर्वादल, हमरि चेलिकि झोली
मेरि प्यारी बजार जा तू, लिभेर आ समान
देर नि कर मेरि पगलि, आब हई जा तू गोली
पूरि तू पिनाऊ पकैर्यै, और मटर पनीर साग
चेलि मुखल मना करलि, भौत छू ऊ भोली
साफ़ करि दे घर भीतेर, तू भ्यार क आंगण
ब्याव बटी छोड़ि दियै तू, वीक कमर खोली
हमरि चेलि कें भाल लागनि, गोभिक पकौड़ी
बस रात्ति बटी धरि दियै तू, बेसन जरा घोली
खुब बनैयै तू भोजन भोव, करियै ना कंजूसी
चेलि दगै मिलुहूँ आलि, सहेलियों की टोली
दिराणि कें बतै दियै ऊ त्यर बटालि हाथ
चेलि कणी करण दियै हंसी और ठिठोली
किस्मतल लाड़ली बनि ठुल घर कि ब्वारी
आब ऊ दगै बात करियै भौत नापि तोली

बेटी की ख़ुशी – भिटौली का दिन

चेली बेटिया खुशि हजानी महैंण एगो चैता
एक दिनाक़ लिजिया औनी सब आपण मैता
पैलिका बुड़ बाड़ियों लै भल धरौ रिवाजा
मैं बाप आंख ताड़ी भेर ठाड़ हजानी छाजा
आज भोव मैत आली उनरी लाड़ली
ईज बाज्यू दगड़ी बैठी ऊ दांत फाड़ली
नानछीना यादों कणी ताजा करि जाली
हमरी पुछली खैर आपणी लै बताली
दुख सुख बांटी जाली सब दिल खोली
ब्याव हणी लौटी जाली लिभेरा भिटौली
नानि नानि गुड़ियां हमरि ईतूक समझदारा
कस संभाली रौछ देखो आपण कारोबारा
य तेरी ईजा लाड़ली दुर्गा क छू रूपा
भौंत कष्ट झेलौ भागी ठंड देख न धूपा
मेरी लाड़ली हम त्यूहणी मांगनू बरदाना
कम नी हो हमरि चेलिक मान व सम्माना
सरास में करियै चेली खुब हमर नामा
तेरि खुशि हमरी लिजिका जसी चार धामा

नोट -यह कविता सोमेश्वर घटी के राजेंद्र सिंह भण्डारी जी द्वारा लिखी गयी है 

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