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चुनावी यात्रा के बीच कांग्रेस प्रत्याशित प्रदीप टम्टा को याद आया 70 का दशक

चुनावी प्रचार अब अपने अंतिम दौर में आ चुका है भाजपा कांग्रेस दोनों के नेता एक-एक व्यक्ति तक अपनी पहुंच बनाने के लिए दिन रात एक करने की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे समय में कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता व अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार प्रदीप टम्टा को 70 का दशक याद आ गया और उन्होंने इसपर अपनी यादों का एक लेख लिखकर फेसबुक पर पोस्ट किया है जोकि इस प्रकार से है… 

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प्रदीप टम्टा की यादों भरा लेख

प्रदीप टम्टा

सत्तर के दशक की बात है जब उत्तर प्रदेश के पर्वतीय आंचल ने कई आन्दोलनों को जन्म दिया शमशेर बिष्ट जी, पी. सी. तिवारी जी , जगत रौतेला जी, अरुण कुकसाल जी, गोविंद भंडारी जी के साथ मैंने उत्तराखंड के तमाम जन संघर्षो, वन आंदोलनों (गौरा देवी चिपको आन्दोलन) और शराबबंदी, शराब नहीं रोजगार दो आन्दोलन आदि में हिस्सा लिया l
उसी दौरान हमने वन बचाओ आन्दोलन तथा पिघलते हिमालय की समस्या को समझने के लिए कई हिमालयी क्षेत्रों की यात्राएं की।
हमने लगभग दो दशकों तक समाज की समस्याओं को गहनता से जानने तथा उसके समाधान के लिए कई गांवों का दौरा भी किया और अलग-अलग लोगों के विचार जानने उनके बीच रहे, देश के अलग-अलग कोनों पर हो रही सांप्रदायिक घटनाओं ने मुझे राजनीति के बारे में सोचने पर विवश कर दिया और ऐसे समय में मुझे कांग्रेस ही एकमात्र ऐसा विकल्प दिखाई दिया जिसमें सभी को एकसाथ लेकर चलने की क्षमता थी परंतु उस दौर में कांग्रेस बहुत कमजोर हो रही थी, पार्टी में कई बदलाव हुए, कुछ लोगों ने पार्टी छोड़ अन्य पार्टियों का दामन थाम लिया लेकिन मैंने उस समय पूर्व मुख्यमंत्री श्री हरीश रावत जी के कहने पर कांग्रेस पार्टी का सिपाही बनने का निर्णय लिया, देखते ही देखते कांग्रेस फिर से नई शक्ति के साथ देश की एकता और अखंडता बनाने के लिए सशक्त हो उठी और सांप्रदायिक व फासिस्ट ताकतों से डटकर मुकाबला किया।
कांग्रेस पार्टी ने हमेशा संविधान के मूल सिद्धांतों का पालन करते हुए समस्त देशवासियों के मन में “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया” की भावना पैदा करने की कोशिश की।

आज फिर कांग्रेस उन्हीं सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ़ डटकर खड़ी है, पहले की भांति हम इसबार फिर से इन विभाजनकारी ताकतों के मनसूबे नाकाम करने में सफल होंगे,
देश में लोकतंत्र की जीत होगी।।“।

चुनाव प्रचार अपने अंतिम दौर पर है ऐसे में सभी नेतागण अपनी पकड़ मजबूत करने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं, दिन रात प्रचार-प्रसार चल रहा है ऐसे में पुरानी यादों का उजागर होना भी स्वाभाविक है।

 

 

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