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मेरी लाज रखो गिरधारी। कुमाऊँनी होली

कुमाऊँनी होली 

महाभारत में एक प्रसंग आता है जब पांडव द्यूत सभा में शकुनी मामा के जाल में फंसकर कौरवों से अपना सबकुछ हार जाते हैं। जब उनके पास दाव पर लगाने के लिए कुछ नहीं बचता है तो वे अपनी पत्नी द्रौपदी को दाव पर लगाकर हार जाते हैं।

उसी सभा के संदर्भ में यह होली लिखी गई है जब कौरवों की सभा में दुर्योधन के आदेश पर दुशासन द्रौपदी का चीर हरण करने के लिए उनकी साड़ी खिंचता है और भगवान की माया से साड़ी इतनी लंबी हो जाती है कि दुशासन खींचते-खींचते थक जाता है ॥

होली इस प्रकार है👉

मेरी लाज रखो गिरधारी

इस अधम सभा में लाज गई, मेरी पत रखो गिरधारी॥

भीष्म, द्रोणाचार्य, कारण, जयद्रथ पड़े-पड़े हैं भुज हरि,
पांचो पति मेरे सम्मुख बैठे उनकी तो गई मति मारी।
मेरी लाज रखो गिरधारी॥

दुष्ट दुशासन बीच सभा में, खिंचत है मेरी साड़ी,
जल्दी आकर लाज बचाओ कहां छुपे हो बनवारी।
मेरी लाज रखो गिरधारी॥

टेर सुनी जब उस अबला की, आए गरुड़ की असवारी,
खींचत-खींचत दो भुज थाके, बन गए चीर मुकुटधारी।
मेरी लाज रखो गिरधारी॥

तन मन धन से सुमिरन कर लो पार करेंगे गिरधारी,
जय राधापति – जय राधापति, तुम्हारे चरण की बलिहारी।
इस अधम सभा में लाज गई, मेरी पत रखो गिरधारी॥

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इन्हें भी पढ़े 👉 

१- हां हां हां मोहन गिरधारी कुमाऊँनी होली ॥

२- कुमाऊँनी होली बलम घर आए फागुन मा ॥

सांवरिया मोहन गिरधारी कुमाऊँनी होली ॥

नोट– यह लेख डाॅ० निर्मला कोरंगा एवं डाॅ० अनुपमा त्रिपाठी जी की पुस्तक कुमाऊँनी होलियां से प्रभावित होकर लिखी गई है।

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